कहीं आपका बच्चा भी तो नहीं खाता है अपने बाल..!
इस गंभीर बीमारी के हैं लक्षण…जानें उपाय…
19 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
परीकथाओं में रैपुंजल के लंबे और खूबसूरत बालों की कहानी तो आपने सुनी होगी, लेकिन अगर कोई बच्चा अपने ही बाल खाने लगे, तो यह किसी कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि एक गंभीर मेडिकल कंडीशन हो सकती है। इस स्थिति को रैपुंजल सिंड्रोम कहा जाता है। यह सिर्फ एक अजीब आदत नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी खतरनाक समस्या है, जो बच्चों के साथ-साथ कभी-कभी बड़ों को भी प्रभावित कर सकती है।
रैपुंजल सिंड्रोम क्यों होता है ?
चिकित्सकों के अनुसार, इस समस्या की जड़ मानसिक और भावनात्मक कारणों में होती है। मानसिक तनाव, चिंता, गुस्सा, या बचपन में हुए किसी भावनात्मक आघात के कारण बच्चे इस आदत के शिकार हो सकते हैं। कई मामलों में यह ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर (OCD) का हिस्सा भी होता है।
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गुस्सा या तनाव में खुद को शांत करने के लिए बच्चे बाल खींचकर खाने लगते हैं।
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ध्यान की कमी, अकेलापन, और भावनात्मक उपेक्षा भी एक बड़ा कारण बन सकते हैं।
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कई बार यह आदत इतनी गहरी हो जाती है कि बच्चा इसे रोक ही नहीं पाता।
इसके खतरे कितने गंभीर हैं?
रैपुंजल सिंड्रोम सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य का मामला नहीं, बल्कि यह शरीर के लिए भी बेहद खतरनाक हो सकता है।
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पेट दर्द और उल्टी का कारण बन सकता है।
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पाचन तंत्र में रुकावट पैदा कर सकता है।
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वजन घटने और कमजोरी की समस्या ला सकता है।
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गंभीर मामलों में आंत फटने का खतरा होता है, जो जानलेवा हो सकता है।
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अगर पेट में बालों का गोला (हेयरबॉल) बहुत बड़ा हो जाए, तो उसे सर्जरी से निकालना पड़ सकता है।
लक्षण कैसे पहचानें?
माता-पिता के लिए जरूरी है कि वे अपने बच्चों के व्यवहार में बदलाव को समझें और समय रहते पहचानें।
इलाज और रोकथाम
रैपुंजल सिंड्रोम का इलाज सिर्फ शारीरिक उपचार से नहीं, बल्कि मानसिक देखभाल से भी जुड़ा है।
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साइकोलॉजिकल थेरेपी: जैसे कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT), जो बच्चे की सोच और आदतों में सकारात्मक बदलाव लाती है।
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काउंसलिंग: बच्चे की भावनाओं को समझना और उन्हें सही तरीके से व्यक्त करना सिखाना।
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परिवार का सहयोग: बच्चे को प्यार, ध्यान और सुरक्षा का एहसास कराना, ताकि वह भावनात्मक रूप से मजबूत बने।
रैपुंजल सिंड्रोम कोई मामूली आदत नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। समय पर पहचान और सही इलाज से न केवल बच्चे की शारीरिक सेहत बचाई जा सकती है, बल्कि उसकी मानसिक भलाई भी सुनिश्चित की जा सकती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के छोटे-छोटे व्यवहारिक बदलावों को भी गंभीरता से लें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।