राजस्थान का वो मंदिर जहां,
होती है चूहों की पूजा
23 days ago
Written By: anjali
राजस्थान के थार मरुस्थल की रेत में बसा एक ऐसा मंदिर, जो अपनी विचित्र परंपराओं और आस्था के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है—करणी माता मंदिर, जिसे आम बोलचाल में "चूहों का मंदिर" भी कहा जाता है। बीकानेर से करीब 30 किलोमीटर दूर देशनोक कस्बे में स्थित यह मंदिर श्रद्धा, रहस्य और स्थापत्य का अद्भुत संगम है।
एक अनोखी आस्था: 20,000 पवित्र चूहे
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है यहाँ निवास करने वाले लगभग 20,000 काले चूहे, जिन्हें "कब्बा" या छोटे बच्चे कहा जाता है। श्रद्धालु इन्हें केवल सहन नहीं करते, बल्कि पूजा करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं, और इनकी देखभाल को पुण्य मानते हैं। अगर कोई चूहा आपके पैर के ऊपर से गुजर जाए या आपको सफ़ेद एल्बिनो चूहा दिख जाए, तो इसे अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है।
मंदिर की भव्यता और स्थापत्य
मुगल स्थापत्य शैली में बना यह मंदिर संगमरमर के अग्रभाग और चाँदी के नक्काशीदार दरवाज़ों से सुसज्जित है। ये दरवाज़े करणी माता की कथाओं को दर्शाते हैं और मंदिर की भव्यता को और बढ़ाते हैं। मुख्य गर्भगृह में करणी माता की प्रतिमा विराजमान है। साल 1999 में, हैदराबाद के एक प्रसिद्ध जौहरी कुंदनलाल वर्मा ने मंदिर के सौंदर्य में चार चाँद लगाते हुए संगमरमर की नक्काशी और चाँदी के चूहों की मूर्तियाँ भेंट की थीं।
पौराणिक कथा: पुनर्जन्म और चूहे
मंदिर की पृष्ठभूमि एक रोचक किवदंती से जुड़ी है। कहा जाता है कि 15वीं शताब्दी में देवी दुर्गा के अवतार करणी माता ने मृत्यु के देवता योमा से एक कथावाचक के पुत्र को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। जब योमा ने इनकार किया, तो करणी माता ने वरदान मांगा कि चारण जाति के सभी पुरुष चूहों के रूप में उनके मंदिर में जन्म लें और फिर करणी माता के वंशज देपावत परिवार में पुनर्जन्म लें।
मंदिर के सेवक: देपावत परिवार
मंदिर की देखरेख का कार्य देपावत वंश के करीब 513 परिवारों द्वारा किया जाता है। ये परिवार बारी-बारी से मंदिर में सेवा करते हैं—चूहों की देखभाल, उन्हें दूध-अनाज देना और परिसर को साफ-सुथरा बनाए रखना उनका मुख्य कर्तव्य है।
दर्शन का समय और शुल्क
खुलने का समय: सुबह 4:00 बजे
बंद होने का समय: रात 10:00 बजे
प्रवेश शुल्क: कोई शुल्क नहीं
कैसे पहुंचे?
देशनोक अच्छी तरह से सड़क, रेल और निजी वाहन सेवा से जुड़ा हुआ है। बीकानेर से टैक्सी, बस या लोकल ट्रेन के ज़रिए मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
मंदिर में क्या करें?
चूहों को प्रसाद अर्पित करना
प्रातःकालीन भोग और प्रार्थना में भाग लेना
हर दो साल में लगने वाले करणी माता मेले में सम्मिलित होना
मंदिर की भव्य वास्तुकला का आनंद लेना
आरती और धार्मिक अनुष्ठानों का अनुभव लेना
जाने से पहले जानें
मंदिर के भीतर प्रवेश से पहले जूते बाहर उतारना अनिवार्य है
मंदिर के भीतर के चूहे ही पवित्र माने जाते हैं—बाहरी चूहों को नहीं
गलती से यदि किसी चूहे को चोट लग जाए, तो सोने या चांदी के कटोरे से उसका प्रायश्चित करना होता है
देर रात या सूर्योदय से पहले दर्शन करना सबसे अच्छा समय माना जाता है—इस दौरान चूहे ज़्यादा सक्रिय होते हैं