असल में लाल नहीं था लाल किला..
जाने कैसे हुआ इस ऐतिहासिक इमारत का रंग लाल..!
26 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
राजधानी दिल्ली में स्थित लाल किला केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की आज़ादी, शक्ति और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। हर वर्ष 15 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री इसी किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता दिवस का शुभारंभ करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे आज हम “लाल किला” कहते हैं, वह शुरू में लाल रंग का था ही नहीं।
पहले कैसा था लाल किला ?
दरअसल मुगल बादशाह शाहजहां ने 17वीं सदी में इस भव्य किले का निर्माण करवाया था। उस समय इसे 'किला-ए-मुबारक' के नाम से जाना जाता था। इस किले को सम्राट की शक्ति, वैभव और भव्यता के प्रतीक के रूप में तैयार किया गया था। इसमें फारसी, तैमूरी और हिंदू स्थापत्य शैलियों का अनोखा संगम देखने को मिलता है। शुरुआत में यह किला सफेद रंग का हुआ करता था। इसकी दीवारें और आंतरिक हिस्से सफेद चूना और संगमरमर से बने थे, जो इसे एक चमकदार सफेद आभा प्रदान करते थे।
अंग्रेजों ने क्यों किया इसे लाल ?
जिसके बाद जब 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के उपरांत जब अंग्रेजों ने लाल किले पर कब्ज़ा किया, तो उन्होंने इसकी मरम्मत और देखरेख का कार्य शुरू किया। समय बीतने के साथ सफेद चूने की दीवारें जर्जर होने लगीं। ऐसे में 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों ने संरक्षण कार्य के दौरान इसकी दीवारों को लाल रंग से रंगवा दिया। यह फैसला केवल रंग-रोगन भर का नहीं था, बल्कि उस समय लाल बलुआ पत्थर की मजबूती और उपलब्धता भी एक बड़ा कारण बनी। इसके बाद से यह ऐतिहासिक इमारत “लाल किला” के नाम से जानी जाने लगी।
लाल किला क्यों है भारत के लिए खास?
लाल किला न केवल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि यह भारत की आज़ादी का भी एक जीवंत प्रतीक है। 15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्र हुआ, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसी किले की प्राचीर से अंग्रेजों का झंडा उतारकर पहली बार भारत का तिरंगा फहराया था। तभी से हर स्वतंत्रता दिवस पर यही स्थान राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में चुना गया। आज भी जब तिरंगा लाल किले पर लहराता है, तो हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।