आयुष्मान भारत योजना को बड़ा झटका…बड़ी संख्या में योजना से दूरी बना रहे निजी अस्पताल…
कारण जानकार हो जाएंगे हैरान…
26 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
सरकार की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) के तहत करोड़ों लोगों को इलाज की सुविधा मिल रही है। लेकिन इस योजना के संचालन को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। खासतौर पर निजी अस्पतालों का इसमें भागीदारी घट रही है, जो कि सरकार की मंशा और ज़मीन पर हकीकत के बीच के फर्क को उजागर करता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी संख्या में प्राइवेट अस्पातल इस योजना से किनारा कर रहें है।
अस्पतालों की भागीदारी में भारी गिरावट
स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने संसद में लिखित जवाब में बताया कि साल 2024-25 में सिर्फ 2,113 नए अस्पताल आयुष्मान योजना से जुड़े। यह संख्या 2023-24 की तुलना में बेहद कम है, जब 4,271 अस्पतालों ने योजना से नाता जोड़ा था। साल 2022-23 में यह संख्या 3,124 थी। इन आंकड़ों से साफ है कि इस साल अस्पतालों की भागीदारी में तेज गिरावट दर्ज की गई है।
कुल कितने अस्पताल जुड़ चुके हैं ?
मंत्री ने जानकारी दी है कि अब तक कुल 31,466 अस्पताल इस योजना में लिस्ट किए गए हैं, जिनमें 14,194 निजी अस्पताल शामिल हैं। योजना शुरू होने के बाद से इलाज के स्वास्थ्य लाभ पैकेजों को पांच बार संशोधित भी किया गया है।
भुगतान प्रक्रिया बनी बड़ी बाधा
हालांकि सरकार का दावा है कि अस्पतालों को भुगतान में देरी न हो इसके लिए सख्त दिशानिर्देश दिए गए हैं। जिसके अनुसार राज्य के अंदर के अस्पतालों को 15 दिनों के भीतर भुगतान किया जाना है। वहीं दूसरे राज्य में स्थित (पोर्टेबिलिटी वाले) अस्पतालों को 30 दिनों में भुगतान का प्रावधान है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में निजी और कॉर्पोरेट अस्पताल इस योजना से दूरी बना रहे हैं।
निजी अस्पतालों की नाराजगी
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि अस्पतालों के पीछे हटने के दो अहम कारण हैं। जिनमें कम फीस (पैकेज रेट्स) और भुगतान में देरी शामिल हैं। इन्हीं कारणों के चलते इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की हरियाणा शाखा ने हाल ही में कहा कि राज्य के कई निजी अस्पताल योजना से हटने को मजबूर हो रहे हैं।
सरकार की सफाई
मंत्री जाधव ने संसद में कहा कि दावों के निपटारे की निगरानी उच्चतम स्तर पर की जाती है और इसे समयबद्ध बनाने के लिए जरूरी उपाय किए जा रहे हैं। हालांकि, अस्पतालों की घटती भागीदारी इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े करती है।