अब भूकंप आने से पहले बजेगी चेतावनी की घंटी..!
बड़ी तबाही से पहले अलर्ट कर सकता है भारत का ये नया सिस्टम…
26 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
30 जुलाई को रूस के कामचटका इलाके में आए 8.8 तीव्रता के भयानक भूकंप ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसके बाद उसी इलाके में 6.0 तीव्रता का एक और झटका महसूस किया गया। इतनी बड़ी तीव्रता वाले भूकंप आमतौर पर अकल्पनीय तबाही का कारण बनते हैं, और यही चिंता भारत जैसे भूकंप-संवेदनशील देशों के लिए और भी बढ़ा देती है। भारत का 59 प्रतिशत भू-भाग भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है, ऐसे में किसी भी बड़े झटके का अंदेशा जान-माल को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में भारत ऐसी परिस्थियों से निपटने के लिये भूकंप का एक ऐसा महत्वाकांक्षी अर्ली-वार्निंग सिस्टम विकसित कर रहा है, जो विनाशकारी माने जाने वाली दूसरी तरंगों (secondary waves) से ठीक पहले तबाही की आहट का संदेश दे सकेगा।
भारत में बड़े भूकंपों की आशंका और ज़मीनी सच्चाई
भारतीय उपमहाद्वीप की भूगर्भीय संरचना ही ऐसी है, जो इसे बार-बार भूकंप के खतरे में डालती है। भारत और यूरेशियन प्लेटों की टकराहट की वजह से धरती के भीतर लगातार हलचल बनी रहती है। जब यह हलचल ज़्यादा बढ़ जाती है, तो यह भूकंप का रूप ले लेती है। समस्या यह है कि अब तक विज्ञान ऐसी कोई तकनीक नहीं बना पाया है जो भूकंप के समय, स्थान और तीव्रता की सटीक भविष्यवाणी कर सके। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों की मौजूदा कोशिशें उम्मीद की एक नई रोशनी लेकर आई हैं।
भारत का महत्वाकांक्षी अर्ली-वार्निंग सिस्टम
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय देश का पहला एडवांस भूकंप डिटेक्शन नेटवर्क तैयार करने की योजना पर काम कर रहा है। इस नेटवर्क का मकसद यह है कि जब धरती में हलचल शुरू हो और प्राइमरी वेव (P-wave) आए, तो उसके कुछ ही पलों बाद आने वाली ज्यादा खतरनाक सेकंडरी वेव (S-wave) से पहले चेतावनी दे दी जाए। क्योंकि, तबाही करने वाली ताकत मुख्यतः सेकंडरी वेव में ही होती है।
मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन ने बताया है कि अभी तक ऐसी कोई तकनीक नहीं बनी है, जो भूकंप का पूर्वानुमान पूरी तरह से कर सके, लेकिन वैज्ञानिक अब ऐसे सिस्टम पर काम कर रहे हैं, जिससे यह समझा जा सके कि भूकंप कब, कहां और क्यों आया। जापान जैसे देशों ने इस दिशा में पहले ही सफलता हासिल कर ली है और अब भारत भी उस रास्ते पर तेज़ी से बढ़ रहा है।
कैसे काम करेगा यह सिस्टम ?
इस अर्ली-वार्निंग सिस्टम को प्रभावी बनाने के लिए पूरे देश में एक्सेलेरोमीटर और GPS उपकरण लगाए जाएंगे, जो धरती की गति और हलचल को बेहद बारीकी से रिकॉर्ड करेंगे। इन आंकड़ों के आधार पर सिस्टम यह पहचान सकेगा कि कब प्राइमरी वेव आई है और तुरंत एक चेतावनी भेज सकेगा ताकि लोग सुरक्षित स्थानों पर जा सकें। अगर सबकुछ योजना के अनुसार चलता है, तो अगले एक दशक में भारत में भी यह सिस्टम सक्रिय हो सकता है।
भारत के भूकंपीय क्षेत्र और उनकी गंभीरता
भारत के भूकंपीय मानचित्र को चार क्षेत्रों में बांटा गया है:
- जोन V – सबसे ज्यादा खतरनाक जोन, देश का करीब 11% हिस्सा इसमें आता है।
- जोन IV – गंभीर भूकंपीय क्षेत्र, लगभग 18% भू-भाग इसमें शामिल है।
- जोन III – मध्यम खतरे वाला क्षेत्र, देश का करीब 30% हिस्सा इसमें आता है।
- जोन II – सबसे कम खतरे वाला क्षेत्र।
इन आंकड़ों से साफ है कि देश का एक बड़ा हिस्सा कभी भी बड़े भूकंप की चपेट में आ सकता है।