राजद्रोह कानून को सुपीम कोर्ट में चुनौती… केंद्र से जवाब तलब…
संवैधानिक वैधता पर उठे सवाल…
22 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 में शामिल राजद्रोह संबंधी प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। यह याचिका मेजर जनरल (रिटायर्ड) एस.जी. वोंबतकेरे ने दाखिल की है। उनका कहना है कि यह प्रावधान औपनिवेशिक काल के राजद्रोह कानून IPC की धारा 124A को नए नाम और व्यापक भाषा में दोहराता है।
केंद्र को जारी किया नोटिस
चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस याचिका को पुराने लंबित मामले से जोड़ते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है। इसके अलावा, इसमें अस्पष्टता, अनुपातहीनता और मनमाने सरकारी कदमों की संभावना को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
सभी कार्यवाहियां स्थगित
जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 124A पर अंतरिम रोक लगाते हुए सभी चल रही कार्यवाहियों को स्थगित किया था। उस समय तत्कालीन CJI एन.वी. रमणा ने पूछा था कि आजादी के 75 साल बाद इस कानून की क्या जरूरत है। BNS की धारा 152 के तहत, यदि कोई व्यक्ति भारत की संप्रभुता, एकता या अखंडता को खतरे में डालने के इरादे से बोलकर, लिखकर, संकेत, डिजिटल माध्यम या वित्तीय साधनों से विद्रोह, अलगाववाद या विध्वंसक गतिविधियों को भड़काता है, तो उसे उम्रकैद या 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1962 के ‘केदारनाथ केस’ का हवाला भी अहम है, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि सिर्फ सरकार की आलोचना राजद्रोह नहीं मानी जाएगी, जब तक कि उसमें हिंसा भड़काने की मंशा न हो।