मेडिकल कॉलेजों में आत्महत्या पर ब्रेक लगाने के लिए अनोखा प्लान..!
आरजीयूएचएस पंखों में लगाएंगे लाइफ सेविंग डिवाइस…
25 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
लगातार आत्महत्या की घटनाओं से हिल चुके कर्नाटक के मेडिकल कॉलेजों में अब बड़ी तकनीकी पहल की जा रही है। राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज़ (RGUHS) ने अपने अधीनस्थ सभी मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टलों में सीलिंग फैन में एंटी-सुसाइड डिवाइस लगाने की योजना बनाई है। यह कदम मांड्या इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (MIMS) में दो हफ्तों के भीतर दो छात्रों की आत्महत्या के बाद उठाया गया है।
सीलिंग फैन नहीं बनेगा ‘फांसी का फंदा’
आरजीयूएचएस के करिकुलम डेवलपमेंट सेल के प्रमुख डॉ. संजीव ने जुलाई के अंतिम सप्ताह में MIMS का दौरा किया। वहां उन्होंने संस्थान के अधिकारियों के साथ मिलकर आत्महत्या की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए तकनीकी उपायों पर विचार किया। सबसे बड़ा सुझाव था – हॉस्टल के पंखों में सेफ्टी मैकेनिज्म का इस्तेमाल।
डिवाइस की खासियत यह है कि जब पंखे पर एक निश्चित सीमा से अधिक भार डाला जाता है, तो यह अपने आप हुक से अलग हो जाता है। साथ ही एक तेज़ सायरन बजता है, जिससे हॉस्टल प्रशासन सतर्क हो जाता है और तुरंत हस्तक्षेप किया जा सकता है। इसका उद्देश्य आत्महत्या को रोकना और संकट में फंसे छात्र को समय रहते मानसिक सहयोग प्रदान करना है।
पायलट टेस्ट शुरू, अलार्म सिस्टम भी एक्टिव
सूत्रों के मुताबिक, इस एंटी-सुसाइड डिवाइस का पायलट परीक्षण MIMS में शुरू हो चुका है। यह पहल उस वक्त और ज़रूरी हो गई जब हाल ही में दो छात्रों ने जान दे दी। 30 जुलाई को कोप्पल जिले के भारत नामक छात्र की हॉस्टल रूम में मौत हो गई, और उसके महज़ तीन दिन बाद 2 अगस्त को अंतिम वर्ष की बीएससी नर्सिंग छात्रा निश्कला ने भी आत्महत्या कर ली।
तकनीकी उपाय के पीछे छिपा मानसिक स्वास्थ्य संकट
हालांकि आरजीयूएचएस की यह पहल तकनीकी रूप से प्रशंसनीय है, लेकिन यह सवाल भी उठाती है – क्या मौतें ही हमारी आंखें खोलेंगी? जब तक संस्थान मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक ऐसी घटनाएं रुकेंगी नहीं। मेडिकल छात्रों पर पढ़ाई का दबाव, अकेलापन, और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ पहले से ही मानसिक तनाव को जन्म देती है। ऐसे में केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं होंगे। ज़रूरत है कि हॉस्टलों में प्रशिक्षित काउंसलर, नियमित मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग, और पीयर सपोर्ट सिस्टम स्थापित किए जाएं। साथ ही, मेडिकल शिक्षा के निर्मम और अति-प्रतिस्पर्धी माहौल में भी बदलाव लाना होगा।