आज ही लिखी गई थी अंग्रेजों को बलिया से भागने के निर्णायक अध्याय की भूमिका…
कहानी पांच साल पहले आज़ाद हुए बलिया के पराक्रम की…
20 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
अगस्त 1942 का वो साल केवल एक तारीख नहीं बल्कि एक जिले के उस शौर्य की कहानी है, जिसने अंग्रेजी शासन की जड़ें उखाड़ कर रख दी और 9 अगस्त से शुरू हुई इस अगस्त क्रांति ने आखिरकार 19 अगस्त को अंग्रेजी शासन को अपने जिले से उखाड़ फेंका। हम बात कर रहे हैं बागी कहे जाने वाले बलिया जिले की अगस्त क्रांति की। जिस दौरान अपने पराक्रम के बल पर इस जिले ने महज 10 दिनों में अपनी स्वराज सरकार बना ली थी। वहीं आज का 11 अगस्त का दिन भी इस अगस्त क्रांति की कहानी में एक खास स्थान रखता है।
11 अगस्त को तैयार हुई निर्णायक अध्याय की भूमिका
इस दौरान अगस्त क्रांति दिन जैसे-जैसे बीतते गए, बलिया की धरती पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनाक्रोश उबाल मारने लगा था। आज़ादी के लिए हर दिल में आग धधक रही थी। गांधीजी के संदेश और बलिया की शान को बचाने का संकल्प गांव-गांव और गली-गली में फैल रहा था और 10 अगस्त को बलिया की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब इस क्रांति की निर्णायक आहट दे चुका था, और इसी लहर ने 11 अगस्त को इतिहास का एक नया अध्याय लिखने की भूमिका तैयार की।
राम अनन्त पाण्डेय ने फूंका था बिगुल
इस दिन जिला कांग्रेस ने पं. राम अनन्त पाण्डेय को “आज का डिक्टेटर” घोषित किया। आस-पास के गांवों और शहर के विभिन्न मुहल्लों से छोटे-छोटे जत्थों में निकला जुलूस जब दोपहर में बलिया चौक (आज का शहीद पार्क) पहुंचा, तो वह उफनते जनसागर में बदल चुका था। उस वक्त चौक खुला मैदान था, जहां नीम के पेड़ों की छांव में हजारों लोग इकट्ठा हो गए।
भीड़ ने भरी हुंकार
रिमझिम बारिश के बीच पं. राम अनन्त पाण्डेय ने टिन के भोंपू से बीस हजार से अधिक की भीड़ को संबोधित किया। यह सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि एक हुंकार थी। अहिंसात्मक आंदोलन का आह्वान और प्रशासन को पंगु बनाने का संकल्प। लोग मान रहे थे कि पुलिस लाठीचार्ज या गोलीबारी करेगी, लेकिन प्रशासनिक अमला भीड़ देखकर दुबक गया। गरम दल की ओर से हमले से निपटने की पूरी तैयारी थी, फिर भी पं. पाण्डेय ने संयम का रास्ता चुना और भीड़ से शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ने का आग्रह किया।
कचहरी में जड़ दिया था ताला
बलिया शहर पहले ही पूरी तरह बंद था। स्कूल-कॉलेज और बाजारों के साथ सरकारी दफ्तरों को बंद कराने के लिए जनसागर कचहरी की ओर बढ़ा, लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही प्रशासन ने ताले जड़ दिए। यह प्रतीक था, जनता की जीत का, जिसकी नींव 9 अगस्त को ही रखी जा चुकी थी।
अमर क्रांतिकारी की गिरफ्तारी से उठी आग
लेकिन विजय के उसी क्षण, जुलूस के बिखरते ही पं. राम अनन्त पाण्डेय को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन यह गिरफ्तारी इस आंदोलन को थाम नहीं पाई। बलिया से उठी आज़ादी की यह चिनगारी गांव-कस्बों तक फैल चुकी थी। जगह-जगह जुलूस और सभाओं की तैयारी होने लगी, जबकि प्रशासन इस लहर को कुचलने की तैयारी में जुट गया। लेकिन पं. राम अनन्त पाण्डेय का यह दिन, उनकी बहादुरी और नेतृत्व, अगस्त क्रांति के इतिहास में एक अमर पन्ना बन गया। जहां बारिश में भीगते, हजारों लोगों के बीच खड़े होकर उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी थी और इस चिंगारी ने उस आग का रूप पकड़ा जिसने 19 अगस्त को अंग्रेजी शासन की जड़ें जला कर रख दीं। जिसके बाद अंग्रेजों को बलिया छोड़ना पड़ा।