RakshaBandhan Special: रक्षाबंधन आता है, राखी सजती है… बस भाई नहीं आता,
70 वर्षीय बहन का 12 साल से टूटा सपना
22 days ago
Written By: Ashwani Tiwari
Rakshabandhan Special: बाड़मेर में रहने वाली 70 वर्षीय धाई देवी और उनकी तीन बहुएं रानी कंवर, दरिया कंवर और सिरसी कंवर के लिए रक्षाबंधन का त्योहार हर साल उम्मीद और इंतजार की कसौटी लेकर आता है। हर बार वे अपने भाइयों की कलाई के लिए राखी सजाती हैं, मगर सरहद के पार बैठे अपने भाइयों तक यह प्यार का धागा नहीं पहुंचा पातीं। धाई देवी साल 2014 में पाकिस्तान से भारत आकर बस गई थीं, लेकिन उनके दिल का एक हिस्सा आज भी सीमा के उस पार है, जहां उनके अपने रहते हैं। पिछले 12 साल से ये चारों बहनें अपने भाइयों का इंतजार कर रही हैं, मगर यह इंतजार हर रक्षाबंधन पर और लंबा हो जाता है।
भाई सरहद के उस पार, राखी रह जाती अधूरी
बाड़मेर शहर के इंद्रा नगर में रहने वाली धाई देवी और उनकी बहुएं आज भी रक्षाबंधन से पहले बाजार जाकर नई-नई राखियां खरीदती हैं। घर आकर वे उन्हें सहेजकर रखती हैं, मानो अगले ही दिन भाई आ जाएंगे। लेकिन त्योहार का दिन आते ही हकीकत सामने आ जाती है न भाई आते हैं, न राखी बंध पाती है। रानी कंवर और सिरसी कंवर के पाकिस्तान में 2-2 भाई हैं, जबकि दरिया कंवर और धाई देवी के 3-3 भाई वहां रहते हैं। 12 साल से न कोई त्योहार साथ मन पाया और न राखी बांधने का सुख मिल पाया है।
थार एक्सप्रेस से थी उम्मीद, अब बढ़ी मुश्किलें
धाई देवी बताती हैं कि उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश भाई की कलाई पर राखी बांधने की है। रानी कंवर कहती हैं, अगर थार एक्सप्रेस फिर से शुरू हो जाए तो दोनों देशों के बीच रिश्तों की डोर मजबूत हो सकती है और मिलना आसान हो जाएगा।
सैकड़ों परिवारों की टूटी आस
पाक विस्थापित जिलाध्यक्ष नरपत सिंह धारा के मुताबिक, आज भी सैकड़ों परिवार ऐसे हैं जिनके भाई-बहन सरहद के उस पार हैं। पहले रक्षाबंधन पर मिलने की उम्मीद रहती थी, लेकिन अब भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में बढ़ी खटास ने यह आस कमजोर कर दी है। धीरे-धीरे रिश्तों की डोर टूटती जा रही है, और राखी के धागों में बंधी उम्मीद हर साल अधूरी रह जाती है।