यूपी में अफसरशाही बनाम माननीयों की जंग…
मंत्रियों से राज्यपाल तक ने ब्यूरोक्रेसी को दिखाया आइना…
24 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
उत्तर प्रदेश में इन दिनों नौकरशाही के खिलाफ मंत्रियों और विधायकों का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है। कभी ऊर्जा मंत्री अपनी ही सरकार के अफसरों पर गंभीर आरोप लगाते हैं, तो कभी कारागार राज्यमंत्री को जेई से दो टूक जवाब मिलता है। कहीं पुल का उद्घाटन बिना स्थानीय विधायक के कर दिया जाता है, तो कहीं खुद राज्यपाल फाइलों की सुस्ती पर तंज कर रही हैं। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यूपी में ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक नेतृत्व के बीच सब ठीक नहीं चल रहा।
ऊर्जा मंत्री एके शर्मा का दर्द
सबसे पहले बात करते हैं ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा की। हाल ही में उनके आधिकारिक एक्स हैंडल से एक पोस्ट साझा की गई जिसमें आरोप लगाया गया कि कुछ बिजली कर्मचारी और अराजक तत्व उन्हें बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं। पोस्ट में कहा गया कि ये वही लोग हैं जिन्होंने बिजली विभाग की छवि खराब की है और अब वही मंत्री की सुपारी लेकर काम कर रहे हैं, क्योंकि ए.के. शर्मा किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं। मंत्री खुद भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते। यह बयान यूपी सरकार में मंत्री और नौकरशाही के बीच दरार को और गहरा करता नजर आया। ऊर्जा मंत्री का यह दर्द काफी समय तक राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना रहा।
जेई से भिड़े कारागार राज्यमंत्री, धरने पर बैठे
इसके कुछ ही दिनों बाद सीतापुर में एक और घटना सामने आई, जहां हरगांव से बीजेपी विधायक और राज्य के कारागार राज्यमंत्री सुरेश राही 15 दिनों से खराब पड़े ट्रांसफार्मर को लेकर धरने पर बैठ गए। मंत्री का आरोप था कि जब उन्होंने इस बारे में बिजली विभाग के जेई को फोन किया, तो जवाब मिला, “खुद ट्रांसफार्मर बदल लीजिए।” मामला बढ़ने पर ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा ने हस्तक्षेप कर जेई को सस्पेंड कर दिया और बाकी विद्युत कर्मचारियों को चेतावनी दी कि यदि जनप्रतिनिधियों या जनता के साथ दुर्व्यवहार हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। मंत्री और जेई के बीच की तीखी बातचीत का वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ।
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का तंज
जब यूपी की ब्यूरोक्रेसी की आलोचना हो रही हो, तो राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का अयोध्या में दिया गया बयान और ज्यादा मायने रखता है। एक CSR कॉन्क्लेव के दौरान राज्यपाल ने कहा, “रामलला के दर्शन तो आसानी से हो जाते हैं, लेकिन फाइलों के दर्शन नहीं होते।” उन्होंने आरोप लगाया कि फाइल एक टेबल से दूसरी, फिर तीसरी और चौथी टेबल तक घूमती रहती है और हर बार कोई न कोई कमी निकाल दी जाती है। राज्यपाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पहली टेबल पर जो बैठा है, वही सभी कमियां निकालकर फाइल पास कर दे। उनका यह बयान ब्यूरोक्रेसी की 'फाइल लटकाने की कला' पर एक तीखा तंज माना गया, जो सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे भारत की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
बिना उद्घाटन पुल खुला, परिवहन मंत्री ने खोया आपा
बलिया में एक और घटना तब सामने आई जब परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह एक नए बने पुल के बिना उद्घाटन चालू हो जाने से नाराज हो गए। यह पुल कटहरनाला में स्थित है और मंत्री का कहना था कि वह शहर में ही मौजूद थे, फिर भी उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई। मंत्री ने लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई और पूछा कि, “क्या तुम्हें बसपा से टिकट मिलने वाला है? या विधायक उमा शंकर सिंह टिकट दिलवा रहे हैं?” उन्होंने इसे गंभीर लापरवाही बताया और कहा कि जानबूझकर उन्हें नजरअंदाज किया गया है। इस घटनाक्रम का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
गहराती खाई और बढ़ती बेचैनी
यह सभी घटनाएं पिछले कुछ दिनों की हैं, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। इससे पहले भी यूपी में जनप्रतिनिधियों और अफसरों के बीच टकराव की खबरें आती रही हैं। सत्ता के गलियारों में चर्चा तेज है कि अगर इस स्थिति को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया, तो सरकार के लिए अंदरूनी स्तर पर दिक्कतें बढ़ सकती हैं। अफसरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ती खाई, सुस्त प्रशासनिक रवैये और राजनीतिक उपेक्षा का ये मिला-जुला रूप कहीं प्रशासनिक संकट में न बदल जाए, यही सबसे बड़ा सवाल है।