मिशन 2027 पर सपा, बसपा के कैडर से सत्ता की वापसी की तैयारी,
अखिलेश ने बाबू कुशवाहा से लेकर लालजी वर्मा तक को सौंपी जिम्मेदारी
29 days ago
Written By: Ashwani Tiwari
Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर करवट लेने को तैयार है। कभी एकछत्र सत्ता पर काबिज रही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अब राजनीतिक हाशिए पर पहुंच गई है, तो वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) ने उसकी खोई हुई ज़मीन पाने की बड़ी रणनीति बनाई है। अखिलेश यादव ने बसपा से आए अपने नेताओं को खास जिम्मेदारी सौंपी है। सपा का मकसद साफ है 2027 के विधानसभा चुनाव में किसी भी कीमत पर सत्ता में वापसी करनी है। इसके लिए पार्टी ने मिशन मोड में काम शुरू कर दिया है।
बसपा कैडर पर सपा की नजर
उत्तर प्रदेश में एक समय ऐसा था जब बहुजन समाज पार्टी के मजबूत कैडर की ताकत से पूरा राजनीतिक परिदृश्य प्रभावित रहता था। कांशीराम के बनाए संगठनात्मक ढांचे ने पूरे प्रदेश में बसपा का नेटवर्क तैयार किया था, जो कुछ घंटों में ही कोई भी संदेश हर जिले तक पहुंचा सकता था। लेकिन मायावती के नेतृत्व में पार्टी की ताकत धीरे-धीरे कमजोर होती गई और सत्ता से बाहर होने के बाद बसपा के कई नेता एक-एक कर दूसरी पार्टियों में शामिल हो गए।
सपा में बसपा के बड़े चेहरे
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में बसपा के कई बड़े नाम जैसे बाबू सिंह कुशवाहा, इंद्रजीत सरोज, लालजी वर्मा, दद्दू प्रसाद, त्रिभुवन दत्त और आरएस कुशवाहा सपा में शामिल हो चुके हैं। अब इन सभी नेताओं को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अलग-अलग क्षेत्रों में जिम्मेदारी देकर भेजा है, ताकि वे पुराने कैडर को फिर से सक्रिय करें और सपा के पक्ष में माहौल तैयार करें। इन नेताओं को साफ निर्देश दिया गया है कि वे दलित समुदाय को यह भरोसा दिलाएं कि सपा की सरकार बनने पर उनके हितों की रक्षा की जाएगी।
दलित वोट बैंक से आसान होगी सत्ता की राह
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा के पास पहले से यादव और मुसलमानों का मजबूत वोट बैंक है। अगर पार्टी दलितों को भी अपने साथ जोड़ने में सफल हो जाती है, तो 2027 में सत्ता की राह आसान हो सकती है। वहीं बीजेपी भी इस रणनीति को समझते हुए अपनी तैयारी में जुटी है। लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों के बाद सपा ने अब विधानसभा 2027 को अपना अगला बड़ा लक्ष्य बना लिया है।
राजनीतिक मुकाबला और तेज होगा
विशेषज्ञ ज्ञानेंद्र शुक्ला के अनुसार सपा की रणनीति मजबूत दिख रही है, लेकिन भाजपा भी इसका जवाब देने को तैयार है। अब देखना होगा कि क्या सपा का यह ‘बसपा कैडर कार्ड’ 2027 में सत्ता तक पहुंचने में मदद करेगा या नहीं। एक बात तय है कि यूपी की राजनीति फिर से जातीय समीकरणों के नए रंग में रंगने वाली है।