बस्ती के स्कूलों में मौत का साया…261 जर्जर भवनों में अब भी चल रही पढ़ाई…
दरकती छत के नीचे पढ़ने को मजबूर नौनिहाल…
27 days ago
Written By: आदित्य कुमार वर्मा
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में शिक्षा व्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन अब जो तस्वीर सामने आई है, वह डराने वाली है। जिले में 261 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जिनकी इमारतें पूरी तरह से जर्जर हो चुकी हैं। इन स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहाल रोज़ मौत के साये में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। हैरानी की बात यह है कि इन भवनों को कागजों में "कंडम" घोषित किया जा चुका है, फिर भी बच्चों को उसी खतरे से भरे ढांचे में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है।
विशुनपुरा प्राथमिक विद्यालय की भयावह तस्वीर
पूरा मामला कुदरहा विकास खंड के विशुनपुरा प्राथमिक विद्यालय से सामने आया है। यहां स्कूल की इमारत की हालत इतनी खतरनाक हो चुकी है कि कोई भी पहली नजर में इसे देखकर सहम जाए। दीवारें फट चुकी हैं, प्लास्टर झड़ चुका है और छत इतनी कमजोर हो चुकी है कि किसी भी दिन भरभराकर गिर सकती है। इसके बावजूद यहां बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, मानो उनकी ज़िंदगी की कोई कीमत ही न हो।
कागजों में जर्जर घोषित, मगर जारी है क्लास
बिल्डिंग को काफी पहले कागजों में जर्जर घोषित कर दिया गया है, लेकिन अभी तक न तो इसे गिराया गया और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई। स्कूल के प्रधानाचार्य राहुल कुमार का कहना है कि भवन "कंडम" घोषित हो चुका है और नीलामी की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है। ऐसे में मजबूरी में इसी बिल्डिंग में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। यानी जान जोखिम में डाल कर शिक्षा देने और लेने का सिलसिला मजबूरी के नाम पर जारी है।
बेसिक शिक्षा अधिकारी भी मानते हैं गंभीर हालात
बस्ती के बेसिक शिक्षा अधिकारी अनूप कुमार ने भी इस गंभीर स्थिति की पुष्टि करते हुए बताया कि जनपद में 261 विद्यालय जर्जर घोषित किए जा चुके हैं। इन भवनों की जांच टेक्निकल कमेटी द्वारा कराई गई है और रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है। अधिकारी भी मानते हैं कि ये इमारतें बच्चों की जान के लिए खतरा हैं, लेकिन "कागजी प्रक्रिया" का हवाला देकर वे खुद को बेबस बता रहे हैं।
शिक्षा के मंदिर में जान का खतरा
इस स्थिति ने शिक्षा और सुरक्षा के बीच टकराव को उजागर कर दिया है। एक ओर सरकार "सब पढ़ें, सब बढ़ें" की बात करती है, तो दूसरी ओर बस्ती जैसे जिलों में हजारों बच्चे ऐसे जर्जर भवनों में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं, जो कभी भी किसी बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं। इस भयावह स्थिति को देखते हुए सवाल उठता है कि, क्या किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही शासन जागेगा? क्या मासूम जिंदगियों के साथ ऐसा जोखिम माफ़ी के लायक है ?