बदल गए आयुष्मान कार्ड के ये नियम, अब इन 3 बीमारियों का प्राइवेट अस्पताल में नहीं मिलेगा मुफ्त इलाज,
जानें पूरी जानकारी
1 months ago
Written By: Ashwani Tiwari
Uttar Pradesh News: हर गरीब को बेहतर इलाज का अधिकार दिलाने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत योजना में सरकार ने एक अहम बदलाव किया है। अब इस योजना के तहत कुछ बीमारियों का मुफ्त इलाज सिर्फ सरकारी अस्पतालों में ही मिलेगा। पहले ये इलाज निजी अस्पतालों में भी मुफ्त में किया जा रहा था, लेकिन अब नए नियमों के मुताबिक कार्डधारकों को इन बीमारियों के लिए सरकारी अस्पतालों की ओर रुख करना होगा। इस बदलाव से हजारों मरीजों पर असर पड़ सकता है जो अब तक प्राइवेट अस्पतालों में इसका लाभ ले रहे थे।
तीन बीमारियों का इलाज निजी अस्पतालों में बंद
स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत अब प्राइवेट अस्पतालों में मस्तिष्क (ब्रेन) संबंधी इलाज, डिलीवरी (प्रसव) और बच्चेदानी का ऑपरेशन (यूट्रस सर्जरी) नहीं हो सकेगा। इन बीमारियों के इलाज और ऑपरेशन की सुविधा अब केवल सरकारी अस्पतालों में ही मुफ्त में दी जाएगी। इन नियमों के लागू होने के बाद जिन मरीजों को इन तीन बीमारियों से संबंधित इलाज की आवश्यकता होगी, उन्हें अनिवार्य रूप से सरकारी अस्पताल जाना होगा।
गरीबों के लिए आयुष्मान बना था वरदान
यह योजना अब तक गरीबों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए बड़ी राहत साबित हो रही थी। 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलना कई परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था। खासकर गंभीर बीमारियों या ऑपरेशनों में लोग प्राइवेट अस्पतालों की सुविधा का फायदा उठा रहे थे। लेकिन अब कुछ बीमारियों में यह सुविधा सीमित कर दी गई है।
आजमगढ़ में 28 आयुष्मान निजी अस्पताल
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार आजमगढ़ जिले में अब तक लक्ष्य से अधिक यानी 110 प्रतिशत लोगों के आयुष्मान कार्ड बनाए जा चुके हैं। जिले में 28 प्राइवेट अस्पताल आयुष्मान योजना के तहत पंजीकृत हैं जहां लोग इलाज करवा रहे हैं। लेकिन अब इन अस्पतालों में मस्तिष्क, डिलीवरी और बच्चेदानी से जुड़ी बीमारियों का इलाज नहीं होगा। इन मामलों में मरीजों को सरकारी अस्पतालों पर ही निर्भर रहना होगा।
नए नियम से क्या होगा असर
इन तीन प्रमुख बीमारियों के मरीजों की संख्या काफी अधिक होती है। ऐसे में निजी अस्पतालों में इलाज बंद होने से सरकारी अस्पतालों में भीड़ बढ़ सकती है। इससे इलाज में देरी और सुविधाओं पर दबाव बढ़ने की आशंका है। हालांकि सरकार का कहना है कि यह कदम इलाज की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और खर्चों को नियंत्रित रखने के लिए उठाया गया है।